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कैंसर

वयोवृद्ध भारतीयों में कैंसर उन पांच सर्व सामान्य कारणों में से एक है जिससे उनकी मृत्यु होती है। कैंसर के विकास में आयु की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हालांकि कैंसर और उम्र बढ़ने के बीच संबंध अस्पष्ट है,लेकिन वृद्धावस्था में कैंसर के बढ़े हुए जोखिम के पीछे संभवत निम्नलिखित कारण हो सकते हैं : कोशिकाओँ की मरम्मत की खराब व्यवस्था, ऐसे जीन का सक्रिय होना जो कैंसर रोग को बढ़ाते हैं तथा ऐसे जीन का दब जाना जो कैंसर के विकास को रोकते हैं,कैंसर के प्रति सतर्कता में कमी तथा कार्सियोजीन्स के प्रति जीवन में सम्पर्क में आना।

कतिपय ऐसे कैंसर होते हैं जो कि अधिकांशत 50 वर्ष की आयु के उपरांत ही होते हैं। इनमें सिर और गर्दन का कैंसर तथा महिला गुप्तांगों के कैंसर, जठरांत्र के उपरी तथा निचले भाग के कैंसर, अग्नाशय तथा प्रोस्टेट ग्रंथि के कैंसर आदि शामिल हैं। वक्ष तथा रुधिर संबंधी आधे से अधिक कैंसर के मामले 60 वर्ष की आयु के उपरांत ही देखने को मिलते हैं।

  • कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए अभिरुचि की कमी
  • समस्या के संबंध में जागरुकता की कमी, तथा
  • आमतौर पर कैंसर के प्रति जानलेवा होने की प्रवृति

ऐसे साक्ष्य हैं जिनसे यह पता चलता है कि वृद्धावस्था में कैंसर की प्रगति भिन्न हो सकती है, लेकिन वयोवृद्ध व्यक्तियों में कैंसर की जानकारी अक्सर रोग के काफी आगे बढ़ जाने पर ही लगती है। निदान में देरी के पीछे निम्नलिखित कारण हो सकते हैं :


प्रबन्धन के सिद्धान्त

वयोवृद्ध व्यक्तियों का जरुरत से कम उपचार किया जाता है क्योंकि यह बहुव्याप्त भ्रान्ति है कि वयोवृद्ध रोगी शल्य चिकित्सा के लिए कम पात्रता रखते हैं तथा उनके द्वारा रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी को भली भांति सहन नहीं किया जाता है। बहुत बड़ी उम्र के व्यक्तियों के संबंध में कैंसर से संबंधित वैज्ञानिक आंकड़ें नगण्य ही हैं क्योंकि अधिकांश अध्ययनों में इस प्रकार के रोगी समूहों को शामिल न करने की प्रवृति होती है। उपचार के संबंध में निर्णय लेते समय वयोवृद्ध व्यक्तियों की जीवन प्रत्याशा को कम नहीं आंका जाना चाहिए। जिस प्रकार से अन्य आयु समूहों के रोगियों के लिए उपचार के सिद्धान्तों को अपनाया जाता है ठीक उसी प्रकार से वयोवृद्ध व्यक्तियों के संबंध में भी कार्रवाई की जानी चाहिए।

आयु का न तो उपचार की कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और न ही यह उच्च विषाक्तता के प्रति प्रवणता होती है। शारीरिक फिटनेस तथा मानसिक स्वास्थ्य पर विचार किया जाना चाहिए न कि कालक्रमानुसार आयु पर तथा रोगोपचार के सभी विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए।


प्रशामक देखभाल

असाध्य अथवा अंतिम अवस्था के कैंसर के रोगियों को होने वाले दर्द,निराशजनक लक्षणों और अन्य मनौवैज्ञानिक मुद्दों की सक्रियता से देखभाल को प्रशामक देखभाल के रुप में परिभाषित किया जाता है। वयोवृद्ध रोगियों को प्रशामक देखभाल प्राप्त करने की अधिक संभावना होती है। प्रशामक देखभाल में सबसे महत्वपूर्ण कार्रवाई चौबीस घंटे के लिए ओरल ओपियम या इसके व्युतपन्नों के साथ दर्द से राहत देने का कार्य शामिल है। सही और ईमानदारी के साथ सभी लक्षणों की लक्षणात्मक देखभाल का प्रयास अवश्य किया जाना चाहिए।


कैंसर की रोकथाम और स्क्रीनिंग

ऐसे उपाय जिनमें जीवन शैली परिवर्तन,आहार तथा व्यायाम शामिल हैं वह वृद्धावस्था में कैंसर की प्राथमिक रोकथाम में संभवत कम महत्व रखते हैं।

दूसरी ओर, स्क्रीनिंग द्वारा समय रहते पता लगा कर द्वितीय स्तर पर रोकथाम बहुत ही अधिक व्यावहारिक मूल्य रखती है। 25 वर्ष की आयु के युवाओं की तुलना में 75वर्ष के पुरुषों में कैंसर सौ गुणा अधिक सामान्य रुप से देखने को मिलता है, इसलिए, स्क्रीनिंग वृद्धावस्था में बहुत अधिक सस्ती पड़ती है। कुछ सामान्य कैंसर जिनकी नैत्यक रुप से स्क्रीनिंग की जानी चाहिए उनमें निम्नलिखित शामिल हैं


  • फेफड़ा- छाती का एक्स रे
  • बृहदान्त्र तथा गुदा- डिजिटल जांच, स्टूल ओकल्ट ब्लड
  • प्रास्टेट- डिजिटल जांच
  • वक्ष- स्व परीक्षा, मैमोग्रीफी
  • महिला गुप्तांग- पैप स्मीयर

फिर भी,अनेक सामाजिक और व्यवहार संबंधी कारणों से वृद्ध व्यक्ति कैंसर स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के प्रति आमतौर पर कोई बहुत अधिक उत्सुकता नहीं दिखाते हैं।

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