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पौष्टिकता संबंधी मूल्यांकन



आहार संबंधी प्रबन्धन



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स्वस्थ खाने के लिए गाइड

वृद्ध व्यक्तियों की पौष्टिकता संबंधी आवश्यकताएं

किसी व्यक्ति के लिए निरन्तर बेहतर स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए पौष्टिकता संबंधी सामान्य आवश्यकताएं जीवन भर बनी रहती हैं हालांकि विकास की पौष्टिकता संबंधी आवश्यकताएं बनी नहीं रहती हैं। रुग्णता, शल्य चिकित्सा अथवा हड्डी टूटने के उपरांत बेहतर पौष्टिक आहार सेवन से शीघ्र रोगोपचार संभव होता है तथा लम्बी जीवनावधि के साथ सामान्य रुप से जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार भी संभव होता है। यह आशा की जाती है कि एक 51 वर्षीय व्यक्ति की पौष्टिकता संबंधी आवश्यकताएं 60, 70, 80 तथा 90 वर्ष के व्यक्ति से भिन्न होती हैं। दुर्भाग्यवश, और अधिक सटीक आयु समूहों में सिफारिशों और आवश्यकताओं को विभाजित करने के लिए पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है। तथापि, किसी वयोवृद्ध व्यक्ति के लिए आहार संबंधी सिफारिशें अनुचित हो सकती हैं क्योंकि वह सिफारिशें वयोवृद्ध व्यक्तियों पर किए गए पौष्टिकता अध्ययनों पर आधारित न होकर युवा वयस्कों पर किए गए अध्ययनों से सामान्य रुप से ली गई होती हैं तथा वह स्वस्थ लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए होती हैं तथा उनमें जीर्ण रोगों अथवा दवाओं के प्रयोग के प्रभावों पर विचार नहीं किया जाता है। उम्र में बढ़ोतरी का अकसर संबंध लीन बॉडी मॉस (मांसपेशियां तथा हड्डियां) में गिरावट तथा शरीर की वसा के अनुपात में वृद्धि के कारण रेस्टिंग एनर्जी एक्सपैंडीचर (आर ई ई) में गिरावट होती है और परिणामस्वरूप उर्जा की आवश्यकताओं में महत्वपूर्ण गिरावट होती है। उम्र बढ़ने के साथ साथ बीमारियों जैसे हड्डी तथा जोड़ों में विकृतियां, अंग विन्यास अस्थिरता तथा ह्रदय रोग आदि के मौजूद होने के कारण शारीरिक गतिविधियां भी कम हो जाती है। इसलिए, आर ई ई में गिरावट तथा शारीरिक गतिविधियों में कमी मिलकर उर्जा की आवश्यकताओं को कम देते हैं। तथापि, यह आमतौर पर देखा गया है कि यह परिवर्तन भिन्न भिन्न व्यक्तियों में अलग अलग समय पर होते हैं, तथा कैलोरी संबंधी आवश्यकताओं के लिए कालानुक्रमिक आयु कोई बेहतर सूचक नहीं है।


स्वास्थकर परिपक्वता के लिए आहार संबंधी कार्यनीतियां

वयोवृद्ध जनसंख्या को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है- कार्यशील वयोवृद्ध, दुर्बल वयोवृद्ध तथा जीर्ण रोगों से ग्रस्त वयोवृद्ध व्यक्ति। इनमें से प्रत्येक समूह की पौष्टिकता संबंधी अपनी अपनी आवश्यकताएं होती हैं। इन वयोवृद्ध व्यक्तियों द्वारा लिए जाने वाला आहार अनेक कारकों से प्रभावित होता है : आयु, लिंग, रहन सहन की स्थितियां, मानसिक और शारीरिक स्थिति, दवा जो उन्हें लेने की आवश्यकता पड़ सकती है, तथा सामाजिक सहायता।

स्वास्थ्यकर युवा पीढ़ी की तुलना में कार्यशील वयोवृद्धों की पौष्टिकता संबंधी आवश्यकताओं में बहुत अधिक भिन्नता होने की संभावना नहीं होती है। कैल्शियम, फोलिएट तथा जिंक का स्तर संस्तुत किए गए स्तरों से कम होता है तथा इन्हें दूध तथा दुग्ध उत्पादों से प्राप्त किया जा सकता है। फोलिएट हरी पत्तेदार सब्जियों तथा फलों में पाया जाता है तथा जिंक लाल मांस, मछली और साबुत अनाज आदि में पाया जाता है।

दुर्बल वयोवृद्ध व्यक्तियों में शेष जनसंख्या की तुलना में पौष्टिकता संबंधी भिन्न आवश्यकताएं होने की संभावना होती है तथा इनके न्यून-पोषण से पीड़ित होने की संभावना अधिक होती है। दुर्बल व्यक्तियों के संबंध में पौष्टिकता संबंधी जटिलताओं में भूख का अभाव, कम आहार सेवन, अनैच्छिक रुप से वज़न में कमी तथा सैक्रोपीनिया (मासपेशियों के मॉस तथा बल में क्रमिक कमी जो कि परिपक्वता के साथ होती रहती है) आदि शामिल हैं।

ह्रदय रोग अथवा उच्च रक्त दाब जैसे जीर्ण रोगों से ग्रस्त वयोवृद्ध व्यक्तियों में रोग का प्रबन्धन करने के लिए विशेष आवश्यकताएं हो सकती हैं। उदाहरण के लिए कॉरोनरी ह्रदय रोगियों के संबंध में संतृप्त आहार- लाल मांस सेवन नहीं करना, आहार संबंधी वसा जैसे घी, मक्खन, क्रीम, नारियल का तेल आदि को कम किया जाना चाहिए तथा फाइबर जैसे साबुत अनाज आदि तथा दालों, फलों और सब्जियों को बढ़ाया जाना चाहिए और स्वास्थ्यकर वज़न को बनाए रखा जाना चाहिए।

उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण रखने के लिए यह सुझाव दिया जाता है कि वज़न तथा नमक को कम किया जाए, कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थों तथा फल और सब्जियों के सेवन को बढ़ाया जाना चाहिए।

प्रत्येक समूह से भिन्न भिन्न संरक्षात्मक खाद्य पदार्थों शामिल करते हुए एक भली भांति संतुलित आहार के अनेक सकारात्मक प्रभाव होंगे तथा इससे मानसिक और शारीरिक भलाई प्रभावित हो सकती है। इससे शरीर को अपना कार्य करते रहने के लिए सभी पौष्टिक तत्वों की उपलब्धता संभव होगी तथा इसके परिणामस्वरूप बीमारी से ग्रस्त होने में देरी होगी तथा वर्तमान बेहतर स्वास्थ्य स्थिति को बनाए रखा जा सकेगा।

कैंसर रोग में आहार एक रक्षात्मक भूमिका का निर्वाह कर सकता है। फाइटो रसायन युक्त अधिसंख्य फल और सब्जियों का सेवन तथा अधिशेष वसा से बचने से कैंसर के विकास के प्रति संरक्षा प्राप्त हो सकती है।

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